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शास्त्रों का व्यावहारिक ज्ञान रखने वाला ही गुरु हो सकता है : ब्रह्मदेव आर्य

समस्कृत भारती ग्वालियर महानगर अंतर्गत चलने वाली दैनिक संस्कृत कक्षा के तत्वाधान में व्यास पूर्णिमा उत्सव का आयोजन किया गया जिसमें कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीमान ब्रह्मदेव आर्य महोदय ने अपने वक्तव्य में महर्षि व्यास के जीवन के बारे में, गुरु कौन है ? उसके क्या लक्षण है ? उसके पास किस प्रकार जाना चाहिए ? और गुरु में कौन-कौन से लक्षण नहीं होने चाहिए इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला उन्होंने बताया कि जो अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाए वही गुरु है । गुरु में सात लक्षण होने चाहिए श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, शिष्य हित को उत्सुक , दक्षता , शीलवान , विनम्रता, प्रेरक । गुरु के समीप नतमस्तक होकर जिज्ञासा पूर्वक सेवा भाव से जाना चाहिए । गुरु के अंदर क्या बातें नहीं होनी चाहिए – सर्वाभिलाषी, सर्वभोजी , सपरिग्रही, अब्रह्मचारी , मिथ्योपदेशदाता ।
            कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डाइट कॉलेज के प्राध्यापक श्रीमान अशोक जारोलिया महोदय ने भी वर्तमान परिवेश में गुरु की भूमिका पर प्रकाश डाला ।
              कार्यक्रम की संचालिका आराधना रावत रही । ध्येय मंत्र अंशुमान, कामिनी एवं रानी भगिनी ने लिया । अतिथि परिचय आदित्य शुक्ला महोदय ने करवाया । स्वागत गीत रानी भगिनी एवं एकल गीत अभिषेक राजावत ने लिया । अंत में आभार प्रदर्शन डॉक्टर बी एस रावत महोदय ने किया । कार्यक्रम में कक्षा के मुख्य शिक्षक श्री कृष्ण कुमार सोनी भी उपस्थित रहे । कार्यक्रम का संयोजन आर्यन एवं आदित्य ने किया ।
सम्पूर्ण कार्यक्रम *संस्कृत भाषा माध्यम* में सम्पन्न हुआ ।

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