बरसों से कुर्सियों से चिपके कर्मचारी, अफसरों की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल
शिक्षकों के इस अटैच मेट से छात्र हो रहे है शिक्षा से वंचित
वीरेंद्र कुमार/मुरैना ब्यूरो
कैलारस। प्रदेश शासन के स्पष्ट और बार-बार जारी निर्देशों के बावजूद कैलारस में अटैचमेंट व्यवस्था कानून नहीं, बल्कि कर्मचारियों की सुविधा के हिसाब से चल रही है। कैलारस में शिक्षा विभाग , बी आर सी कार्यालय , एवं बी ओ,ऑफिस कार्यालय, कैलारस में कई शिक्षक ऐसे हे जिन्होंने स्कूल न जाने की बजह से अपना अटैच मेट अपनी मन पसन्द कार्यालयो में करवा लिया गया हैं इस अटैच मेट प्रक्रिया से स्कूलों में शिक्षा का स्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है जबकि शासन के निर्देशानुसार अटैचमेंट पूरे तरीके से खत्म कर दिया गया है इसके बावजूद भी कैलारस में अटैचमेंट अभी भी पूर्ण तरीके से बना हुआ है शासन के नियमो को ठेंगा दिखाते हुए स्थानीय अधिकारियों से साठ गांठ करके अपने रसूख वाले दबदबा के साथ कार्यालय में अपनी जड़े जमाए बैठे हैं हुए हालात यह हैं कि कई कर्मचारी वर्षों से एक ही कार्यालय में अटैचमेंट पर जमे हुए हैं और शासन के आदेशों को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि यह अटैचमेंट अब अस्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थायी मलाईदार पोस्टिंग बन चुकी है। स्थानीय होने का फायदा उठाकर कुछ कर्मचारी न केवल ट्रांसफर से बचे हुए हैं, बल्कि कार्यालयों को अपनी निजी जागीर समझने लगे हैं। कामकाज में मनमानी, आम जनता से रूखा व्यवहार और फाइलों को दबाकर रखना अब आम बात हो चुकी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सब कुछ अधिकारियों की जानकारी में होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही। सवाल यह है कि
क्या ये अटैचमेंट किसी ‘ऊपर तक’ की सहमति से चल रहे हैं?
या फिर जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से एक ही जगह जमे हुए कर्मचारियों के कारण भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण मिल रहा है। शासन की योजनाएं कागजों में चल रही हैं, जबकि ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। ग्रामीणों को अपने ही काम के लिए कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। ओर उनके साथ अपमानित व्यवहार किया जाता है
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि:-
क्या कैलारस में शासन के आदेश लागू नहीं होते?
या फिर अटैचमेंट का यह ‘सिस्टम’ शासन से भी ऊपर खड़ा हो चुका है?
यदि जल्द ही इस अटैचमेंट राज पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला शासन की साख पर एक और बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरेगा।

