वीरेंद्र कुमार/ मुरैना ब्यूरो
मुरैना 29 मार्च। भारतीय शिक्षा व्यवस्था के गलियारों में इन दिनों एक अजीब सा तमाशा चल रहा है। जिस शिक्षक ने दो दशकों तक हजारों भविष्य गढ़े, जिसने ब्लैकबोर्ड पर चाक घिसते-घिसते अपनी उंगलियों की पोरें घिसा लीं, और जिसकी पढ़ाए हुए छात्र आज दुनिया के कोने-कोने में देश का नाम रोशन कर रहे हैं—आज सरकार उससे पूछ रही है, “क्या आप वाकई पढ़ाने के काबिल हैं?”
20 साल बनाम 2 घंटे की परीक्षा:-
कल्पना कीजिए, एक डॉक्टर जिसने 20 साल सफल सर्जरी की हो, उसे कहा जाए कि ऑपरेशन छोड़ो पहले ‘मेडिकल एंट्रेंस’ पास करो। या एक अनुभवी पायलट से कहा जाए कि उड़ान बंद करो, पहले ‘टेक-ऑफ’ की थ्योरी लिख कर दिखाओ। सरकार का यह तर्क कि 20 साल के अनुभव पर ‘TET’ (शिक्षक पात्रता परीक्षा) भारी है, हास्यास्पद लगता है।
यदि 20 साल बाद सरकार को अपने ही शिक्षकों पर शक हो रहा है, तो यह शिक्षकों की नहीं बल्कि सरकार की चयन प्रक्रिया और प्रशिक्षण प्रणाली की हार है।

क्या 20 साल तक सरकार सो रही थी?
क्या हर साल होने वाले निरीक्षण और रिपोर्ट ‘फर्जी’ थे?
अगर शिक्षक अयोग्य थे, तो उन्हें इतने वर्षों तक वेतन और प्रमोशन किस आधार पर दिया गया?
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति के साथ तालमेल बिठाने के लिए यह जरूरी है। लेकिन क्या ‘पात्रता परीक्षा’ अपडेट होने का एकमात्र तरीका है? एक अनुभवी शिक्षक को वर्कशॉप और ट्रेनिंग के जरिए तकनीक से जोड़ा जा सकता है, न कि उसे परीक्षा के तनाव में झोंककर। यह तो वही बात हुई कि किसी पुराने बरगद के पेड़ को इसलिए उखाड़ दिया जाए क्योंकि उस पर ‘स्मार्ट वॉच’ बांधने की जगह नहीं है। “अनुभव की सफेदी बालों में यूं ही नहीं आती, यह वह डिग्री है जो किसी यूनिवर्सिटी में नहीं मिलती। लेकिन अफसोस, सरकार को बालों की सफेदी नहीं, मार्कशीट की सफेदी चाहिए।”
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एक शिक्षक के लिए समाज में उसकी प्रतिष्ठा ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। जब वह अपने ही पूर्व छात्रों के साथ परीक्षा केंद्र की लाइन में खड़ा होता है, तो उसकी गरिमा को जो चोट पहुँचती है, उसका हिसाब कौन देगा? सरकार का यह कदम शिक्षकों को ‘गुरु’ की पदवी से उतारकर महज एक ‘कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी’ की श्रेणी में खड़ा करने जैसा है।
शिक्षा में सुधार के नाम पर पुराने अनुभवी शिक्षकों को कागजी औपचारिकताओं में उलझाना केवल प्रशासनिक विफलता को छिपाने का एक तरीका है। सरकार को समझना चाहिए कि TET केवल ‘पात्रता’ जाँचेगी, ‘पवित्रता’ और ‘समर्पण’ नहीं। अनुभव को परीक्षा की कसौटी पर कसना बंद होना चाहिए, क्योंकि अनुभव स्वयं में सबसे बड़ी परीक्षा है।
यदि 20 साल की सेवा के बाद भी शिक्षक ‘अपात्र’ है, तो साहब, दोष शिक्षक का नहीं, उस पूरी व्यवस्था का है जिसने उसे दो दशकों तक ढोया। व्यवस्था बदलनी है तो बुनियाद बदलिए, उन स्तंभों को मत हिलाइए जिन्होंने इस इमारत को संभाल रखा है। मैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से यही कहूंगा कि जल्द से जल्द जो निर्णय लिया गया उसे वापसी करें और इस युग पुरोधा जिन्होंने इस देश की अनगिनत प्रतिभाओं को गढ़ा सरकारकोई ऐसा गलत निर्णय ना लें अन्यथा यह श्रवण समाज एवं क्षत्रिय समाज सड़कों पर उतरना पड़ेगा और इन शिक्षकों के न्यायहित में हमें किस हद तक जाना पड़े उसमें हमें कोई संकोच नहीं होगा


